आमेर किला जयपुर

आमेर का किला Amer Fort

यह दुर्ग अरावली की पहाड़ियों पर बसा हुआ है, अपनी छटा बिखेरता हुआ चारों और पहाड़ियों से युक्त है। यह दुर्ग मुग़लों की शरण स्थली रहा था। जब तक राजधानी जयपुर नहीं बनी, तब तक कछवाहा वंश की राजधानी यही दुर्ग रहा। इस दुर्ग के पास एक गांव है, जिसका नाम आमेर है, जो की पूर्णतः हाथियों को समर्पित है। विश्व में सिर्फ तीन ही गांव हाथियों को समर्पित हैं। उनमें से दो थाईलैंड व श्रीलंका में है, तथा तीसरा भारत के आमेर में स्थित है।

आमेर के किले का नाम कैसे पड़ा

इस किले का नाम अंबिकेश्वर महादेव के नाम पर आम्बेर पड़ा, जो बाद में आमेर में परिवर्तित हो गया। अंबिकेश्वर महादेव कछवाहा वंश के कुल देवता हैं।

आमेर के किले का इतिहास

जहां आज आमेर का किला है वहां पहले एक महल था जिसका नाम था कदमी महल जहां पर कछवाहा वंश के शासकों का राजतिलक होता था। बाद में अकबर के सेनापति मिर्जा राजा मानसिंह ने 1592 ईस्वी में इस दुर्ग का निर्माण करवाया। आमेर के शासकों की दीर्घकालीन राजधानी व स्थाई निवास स्थान यही दुर्ग रहा है।

Amer Fort jaipur

आमेर के किले की चित्र कला

आमेर का महल अपने भित्ति चित्र कला के लिए सुप्रसिद्ध है। इस कला में खिड़कियों झरोखों में बारिक कारीगरी होती है, जो कि दूर से स्वर्ण द्वारा निर्मित प्रतीत होते हैं। यह कला अकबर के समय में मुख्यतः मुग़लों द्वारा भारत में लाई गई थी। यह भित्ति चित्र कला पर्सियन, ईरान या इराक से भारत में आई, यह चित्र कला में मुगल शैली की विशेषता है। यह राजस्थान का प्रमुख दुर्ग है। जो हिंदू और मुगल शैली में निर्मित है।

आमेर के किले की झील

इस किले की तलहटी में एक झील है। जिसे मावठा या पावठा कहा जाता है। किसी समय इस स्थान पर केसर की खेती की जाती थी। इसलिए यहां आज भी एक केसर की छोटी सी क्यारी है।

आमेर किले के द्वार
1. गणेश पोल- यह आमेर के किले का मुख्य प्रवेश द्वार है।
2. जय पोल- गणेश पोल के बाद दूसरा उप मुख्य द्वार आता है। जिसका नाम जय पोल है।

आमेर किले के मंदिर

शीला देवी मंदिर- गणेश पोल से प्रवेश करने के पश्चात चौक आता है। जिसे जलबी चौक बोलते हैं। इसी चौक में शीला देवी का मंदिर बना हुआ है। ये कछवाहा वंश की आराध्य देवी है। इसका निर्माण मिर्जा राजा मानसिंह ने करवाया था। यह मूर्ति उन्होंने 1594 में बंगाल के केदार कायत को हराकर दहेज में प्राप्त की थी उन्होंने इनका मंदिर आमेर में बनवाया।

जगत शिरोमणि मंदिर- इस मंदिर का निर्माण मिर्जा राजा मानसिंह की पत्नी कनकावती ने, अपने पुत्र की अल्पायु में मृत्यु हो जाने के पश्चात उसकी याद में करवाया था। यहां पर काले रंग के कृष्ण जी की मूर्ति है, जोकि मिर्जा राजा मानसिंह ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण के दौरान प्राप्त की थी। माना जाता है कि इस मूर्ति की पूजा मीराबाई करती थी। इसीलिए इस मंदिर का दूसरा नाम मीरा मंदिर भी है।

आमेर किले के महल

कदमी महल- आमेर के किले का यह सबसे प्राचीन महल है। जिसका निर्माण रामदेव ने करवाया था। इस महल में कछवाहा वंश के शासकों का राजतिलक होता था।

दीवान ए आम- यहां पर राजा का दरबार लगता था, तथा राजा अपने मंत्रियों व अन्य लोगों से मिलते थे। यहां पर विचार विमर्श आदि कार्य किए जाते थे।

दीवान ए खास- यह महल राजा का निजी महल होता था। यहां दूसरों को आने की इजाज़त नहीं थी।

शीश महल- आमेर के किले का शीश महल राजस्थान के सभी शीश महलों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

एक जैसे 16 महल- यहां राजा ने अपनी 16 रानियों के लिए एक जैसे 16 महलों का निर्माण करवाया था।

सौभाग्य मंदिर या सुहाग मंदिर- यह महल रानियों के हास परिहास, व कुतूहल के लिए बनाया गया था।

जय मन्दिर- यह महल दर्पण जड़े फलकों से बना है, इस कारण यह आकरषण का केंद है।

किले के कुछ अन्य आकर्षण

चमत्कारी पुष्प- यह एक मार्बल पत्थर पर उकेरी गई फूल की आकृति हैं। जो देखने में बहुत ही चमत्कारिक लगती हैं। इसके साथ ही इस पर दो तितलियां, मछली की आकृति, कमल, कोबरा का फन, हाथी की सूंड, शेर की पूंछ, बिच्छू आदि की आकृतियां भी उकेरी गई हैं।

किले की गुफा- आमेर के किले में लगभग 2 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग है। जोकि जयगढ़ किले को आमेर के किले से जोड़ती है।

आमेर का किला जयपुर उच्च कोटि की कला का नमूना माना जाता है। इसके महल बहुत ही सुंदर हैं। इनका निर्माण लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर द्वारा करवाया गया था। यह किलकिला पर्यटन का प्रमुख केंद्र है, यहां हर वर्ष लाखों पर्यटक देश और विदेश से आते हैं।

जंतर मंतर जयपुर के बारे मे पढ़े ।

धन्यवाद

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