भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की आन बान और शान का प्रतीक है। यह ध्वज भारत की आजादी के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और क्रांतिकारियों के बलिदान का प्रतीक है, जिनके प्रयासों ने देश को आजादी दिलाई है। इस लेख में हम तिरंगे झंडे के इतिहास के बारे में विस्तार से जानेंगे, समय-समय पर इस में आए हुए परिवर्तनों के बारे में जानेंगे तथा यह जानेंगे कि इसके निर्माण की प्रक्रिया क्या है? इसके रखरखाव का क्या तरीका है? तथा इसकी गरिमा को किस प्रकार बनाए रखा जा सकता है? तो आइए, आजादी के प्रतीक देश की शान तिरंगे झंडे के बारे में विस्तार से जानते हैं।

भारतीय तिरंगे झंडे का इतिहास

देश की आजादी के लिए प्रयास कर रहे क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सेनानियों ने इस देश के प्रतीक चिन्ह के लिए समय-समय पर झंडे बनाए थे। जिस कारण तिरंगे का स्वरूप समय-समय पर बदलता आया है। आइए भारतीय तिरंगे झंडे का इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से समझे।

पहला झंडा- कोलकाता के पारसी बागान (स्क्वेयर) पर 7 अगस्त, 1906 को भारत देश का पहला झंडा फहराया गया। इस झंडे को सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने 101 पटाखों की सलामी के साथ फहराया था। यह झंडा लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बना हुआ था। इस में हरा रंग सबसे ऊपर, पीला बीच में और लाल सबसे नीचे था। हरे रंग में 8 आधे खिले हुए कमल थे, पीले रंग की पट्टी में वंदे मातरम लिखा हुआ था तथा नीचे की पट्टी में सूरज व चाँद का निशान था।

दूसरा ध्वज- भारत का दूसरा ध्वज जर्मनी में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में 22 अगस्त, 1907 को मैडम भीखाजी खामा ने फहराया था। इस झंडे को बनाने वाले श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर व मैडम खामा थी। यह झंडा विदेश में फहराया जाने वाला पहला भारतीय ध्वज था।

तीसरा ध्वज- सन 1917 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान डॉक्टर एनी बेसेंट और लोकमान्य गंगाधर तिलक ने होम रूल आंदोलन में भारत के तीसरे ध्वज को फहराया। इस ध्वज में पांच लाल रंग की और चार हरे रंग की क्षैतिज पट्टीयाँ थी। इस ध्वज में सात सितारे थे, तथा चांद और सूरज के चिन्ह थे।

चौथा ध्वज- देश का चौथा ध्वज 1921 में बीज वाड़ा में चल रहे कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान पिंगली वेंकैया नाम के एक युवक ने गाँधीजी को भेंट किया था। इस ध्वज में लाल और हरे रंग की पट्टियां थी। लाल रंग हिंदू व हरा रंग मुस्लिम समुदाय का प्रतीक था। गांधी जी ने लाला हंसराज की सिफारिश पर इसमें भारत के बाकी समुदायों के लिए सफेद रंग की पट्टी लगवाई तथा देश की प्रगति को दर्शाने के लिए चरखा इसमें बनाया गया।

पांचवा ध्वज- यह ध्वज 2 अप्रैल, 1931 को बनाया गया। इसे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए 7 सदस्य समिति द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया। इस ध्वज में केसरिया सफेद व हरे रंग का प्रयोग किया गया, तथा इसके मध्य में चरखा था। यह ध्वज उस समय की आजादी की जन भावना का प्रतीक था।

छठा ध्वज- आजादी के बाद देश के झंडे का चुनाव करने के लिए डॉ राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली एक समिति बनाई गई, इसमें पिंगली वेंकैया का डिजाइन किया हुआ झंडा अपनाया गया। बदरुद्दीन तैयब और सुरैया तैयब जी की सलाह पर चरखा हटाकर उसके स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दिया गया। 22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा ने इसे आजाद भारत के राष्ट्र ध्वज के रूप में अंगीकृत किया था।

तिरंगे झंडे की आकृति व आकार

देश के झंडे को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड BIS के मानकों के आधार पर बनाया जाता है। तिरंगे झंडे में तीन रंगों की क्षैतिज पट्टियां होती हैं। इनमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद तथा सबसे नीचे गहरे हरे रंग की समान अनुपात की पट्टियां होती हैं। तिरंगे झंडे की चौड़ाई व लंबाई का अनुपात 2:3 होता है। सफेद पट्टी के बीच में गहरे नीले रंग का चक्र होता है, जो कि सारनाथ के शेर के स्तंभ से लिया गया है। इस चक्र का व्यास सफेद पट्टी की चौड़ाई के लगभग बराबर ही होता है। इस चक्र में 24 तिलिया होती हैं, जो कि दिन के 24 घंटों का प्रतीक है।

तिरंगे झंडे के नो विभिन्न आकार निर्धारित किए गए हैं। इनमें सबसे छोटा 6 इंच लंबा और 4 इंच चौड़ा है, तथा सबसे बड़ा झंडा 21 फीट लंबा और 14 फीट चौड़ा आकार निर्धारित है।

तिरंगे झंडे के तीन रंग किस बात के प्रतीक हैं? तिरंगे के रंगों का अर्थ

राष्ट्रीय ध्वज का केसरिया रंग ताकत व साहस का प्रतीक है। ध्वज का सफेद रंग शांति वह सत्य का प्रतीक है, और हरा रंग कृषि, विकास और पवित्रता का प्रतीक है। ध्वज में मौजूद अशोक चक्र इस बात का प्रतीक है कि, जीवन चक्र की तरह गतिमान है, तथा मृत्यु निश्चित है।

भीखाजी कामा श्रीमती भीखाजी जी रूस्तम कामा (मैडम कामा) ने जर्मनी के स्टटगार्ट नगर में 22 अगस्त 1907 में हुई सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में भारत का प्रथम तिरंगा राष्ट्रध्वज फहराया था।

भारत का राष्ट्रीय ध्वज कहां पर बनाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज बनाने का एक मात्र स्थान कर्नाटक के दूसरे बड़े शहर हुबली में कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ फेडरेशन है। यहां पर लोग शांति भाईचारे और अमन की भावना को मन में रखकर पूरे सम्मान के साथ देश के ध्वज को बनाते हैं। आधिकारिक रूप से तिरंगे झंडे का निर्माण करना इन की जिम्मेवारी है। यही के बनाए झंडों को राष्ट्रीय पर्वों पर देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति विभिन्न स्थानों पर फहराते हैं। यही के झंडे सरकारी इमारतों व देश विदेशों में कराए जाते हैं। यहां पर 2004 से झंडे बनाने का काम चल रहा है। सरकारी नियमों के अनुसार देश में और कहीं झंडा नहीं बनाया जा सकता है। अब तक यहां पर लगभग 5 करोड से अधिक झंडे बन चुके हैं। यहां पर तिरंगे के निर्माण का कार्य केवल महिलाएं करती हैं। जिस जगह पर झंडे का निर्माण होता है, वहां पर चप्पल पहन कर जाना प्रतिबंधित है।

तिरंगे झंडे का निर्माण कैसे किया जाता है?

झंडा बनाने के लिए सबसे पहले उत्तम दर्जे की रूई ली जाती है। जिसे चरखों की सहायता से धागे में बदला जाता है। उसके बाद हथकरघा उद्योग की सहायता से खादी का कपड़ा बनाया जाता है, फिर उन्हें नाप कर तीन पट्टियां काट दी जाती हैं। जिनमें से एक को केसरिया रंग दिया जाता है, दूसरे को गहरा हरा रंग दिया जाता है तथा सफेद रंग के लिए ब्लीच किया जाता है। सफेद पट्टी पर एक साथ दोनों तरफ अशोक चक्र छापा जाता है ताकि, डिज़ाइन एक दूसरे के बिल्कुल पीछे आए। फिर तीनों पार्टियों को महिलाओं द्वारा एक साथ सिला जाता है, उस बीआईएस द्वारा झंडे की जांच की जाती है। यदि आकार रंग आदि के कारण झंडे में कोई कमी रह जाती है तो उसे अमान्य घोषित कर दिया जाता है। तथा उसे सम्मान के साथ 5 लोगों के सामने जमीन में गाड़ देते हैं या फिर चंदन की लकड़ी में जला दिया जाता है।

झंडे को तह कैसे किया जाता है ?

झंडे को तह करने के लिए सम्मान के साथ सीधा पकड़ा जाता है। फिर केसरिया पट्टी को सफेद पट्टी के ऊपर मोड़ा जाता है। उसके बाद हरी पट्टी को केसरिया पट्टी के ऊपर मोडा जाता है। फिर जो लंबी तह बनती है, उसे दोनों तरफ से मोडा जाता है। झंडे को तह करने के बाद अशोक चक्र बीच में दिखाई देता है, तथा इसे सम्मान के साथ रख दिया जाता है। झंडे का कभी भी जमीन के साथ स्पर्श नहीं होना चाहिए ओर उसे किसी ऐसी जगह पर नहीं रखना चाहिए जहां पर इसकी गरिमा कम हो।

तिरंगा झंडा कौन फहराया सकता है?

आजादी के बाद लगभग 60 वर्ष तक आम लोग अपने घरों या ऑफिस पर झंडा नहीं लगा सकते थे। झंडा सिर्फ सरकारी इमारतों पर ही फहराया जा सकता था। परंतु 23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों को गरिमा के साथ झंडे को फहराने का अधिकार दिया। अनुच्छेद 19(1) के तहत तिरंगा फहराना मूल अधिकार बताया गया है।

तिरंगा झंडा फहराने के क्या नियम है?

भारत में झंडा फहराने के नियमों के लिए भारतीय ध्वज संहिता नाम का कानून है। इसके अनुसार फटा हुआ झंडा नहीं फहरा सकते, तिरंगे झंडे के ऊपर कोई अन्य प्रतीक नहीं लगा सकते, झंडे का उपयोग व्यापार के लिए, कपड़ा पहनने के लिए, कवर आदि लगाने के लिए नहीं कर सकते।
राष्ट्रीय ध्वज को सूर्य उदय के बाद फहराना होगा तथा सूर्य अस्त से पहले उतार लेना होगा। जब कोई राष्ट्रीय विभूति का निधन होता है, तो राष्ट्रीय शोक के समय तिरंगे झंडे को थोड़ा झुकाया जाता है। शहीदों को तिरंगे झंडे में लपेटा जाता है। उस समय केसरिया रंग शहीद के सिर की तरफ तथा हरा रंग शहीद के पैरों की तरफ रखा जाता है।

तिरंगे झंडे का रखरखाव बहुत ही गरीमां पूर्ण तरीके से करना चाहिए। झंडे को कभी भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए व इसे किसी पवित्र स्थान पर सम्मान के साथ रखना चाहिए। झंडे के गलत तरीके से उपयोग के लिए 3 साल तक की सजा का प्रावधान है।

भारत का ध्वज 29 मई, 1953 को सर एडमंड हिलेरी और तेन्ज़िंग नोर्गा ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर फहराया था। विंग कमांडर राकेश शर्मा ने 1984 में भारत का ध्वज अंतरिक्ष में स्थापित किया था।

भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश के सम्मान का प्रतीक है, इसलिए प्रत्येक नागरिक को तिरंगे का गरिमा पूर्ण तरीके से प्रयोग करना चाहिए। इस के सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। देश के वीर जवान इस तिरंगे की रक्षा के लिए अपना जीवन तक न्योछावर कर देते हैं। हमें अपने देश के तिरंगे के इतिहास को जानना चाहिए। इसके स्वरूप तक पहुंचने की कहानी को समझना होगा। इसके निर्माण की प्रक्रिया, इसके रखरखाव की विधि आदि सब को सही तरीके से समझ कर ही हमें इसका उपयोग करना चाहिए, ताकि इस के सम्मान में कहीं चूक न रह जाए।
धन्यवाद

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