भारतीय संसद भवन का इतिहास व भवन की कहानी

संसद भवन की कहानी Parliament of India

93 साल का इतिहास संजोए संसद भवन की यह इमारत भव्यता और सादगी के संतुलन की अनोखी मिसाल है। इसी भवन के अंदर भारत माता पर पड़ी हुई सैकड़ों सालों की बेड़ियों को काटा गया था, तथा आजादी की पहली सांस इसी इमारत के अंदर ली गई थी। आजादी के बाद इस लोकतंत्र के मंदिर से, जनता द्वारा चुने गए दिग्गज नेताओं ने इस देश को नई दिशा दी। जिसके बलबूते पर देश आज 21वीं सदी में विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। इसी इमारत की एक एक दीवार भारत के इतिहास की गवाह है। इस इमारत की एक एक दीवार में इसे बनाने वाले मज़दूरों और कलाकारों के पसीने की खुशबू आज भी रची बसी हुई है।

भारतीय संसद भवन का इतिहास

सन 1911 में भारत की राजधानी कोलकाता से बदलकर नई दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया गया। इसके लिए वास्तुकार एडमिन लुटियन ने रायसिना हिल्स पर नई दिल्ली का नक्शा तैयार किया। जिसमें वायसराय हाउस जो कि अब राष्ट्रपति भवन है, सचिवालय, इंडिया गेट ओर कई अन्य इमारतों की रूपरेखा बनाई गई। इस नक्शे में संसद भवन शामिल नहीं था। संसद भवन को शहर की योजना में बाद में शामिल किया गया। भारत में द्विसदनीय संसदीय प्रणाली लागू करनी थी, इसी आधार पर  इसके निर्माण की रूपरेखा तैयार की गई।

राष्ट्रपति भवन की नींव 12 फरवरी, 1921 में ड्यूक ऑफ़ कनॉट  प्रिंस आर्थर ने रखी। इस इमारत को तैयार होने में 6 वर्ष का समय लगा। 18 जनवरी, 1927 को लॉर्ड इरविन ने हरबर्ट बेकन द्वारा दी गई सोने की चाबी से इस इमारत का उदघाटन किया इस इमारत को बनाने में उस समय कुल 83 लाख रुपए खर्च आया, तथा हजारों मज़दूरों व कलाकारों ने इसे बनाने में अपना योगदान दिया।

संसद भवन का वास्तुकार कौन था? / संसद भवन किसने बनवाया?

इस इमारत के मुख्य वास्तुकार के रूप में हरबर्ट बेकन को चुना गया। हरबर्ट बेकन ने संसद भवन के लिए एक त्रिकोणीय इमारत का नक्शा तैयार किया। जिसमें सेंट्रल हॉल के ऊपर एक ऊंचा गुंबद था। परंतु उस समय दिल्ली के मुख्य वास्तुकार एडमिन लुटियंस ने एक गोलाकार इमारत का प्रस्ताव रखा, जिसमें गुंबद की ऊंचाई अधिक नहीं थी। जिससे इमारत के पास जाने पर गुंबद दिखाई ना दे। अंतिम निर्णय एडमिन लुटियंस के पक्ष में लिया गया तथा गोलाकार इमारत को मंजूरी दे दी गई।

भारतीय संसद भवन कहां स्थित है?

संसद भवन भारत की संसद की सीट है, जिसमें नई दिल्ली स्थित लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं। अत: भारतीय संसद भवन संसद मार्ग, नई दिल्ली मे स्थित है ।

संसद भवन में कितने कमरे हैं?

इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन कुछ सूत्रों के अनुसार भारतीय संसद भवन में 340 कमरे हैं।

संसद भवन की वास्तुकला

संसद भवन का डिज़ाइन अंग्रेजी, हिंदी व इस्लामिक वास्तुकला  का मिला जुला रूप है। वृत्ताकार भारतीय संसद भवन भले ही विदेशी वास्तुकारों ने डिज़ाइन किया हो, परंतु इसे बनाने में भारतीय मिट्टी व भारतीय मज़दूरों कलाकारों की कड़ी मेहनत लगी हुई है।

संसद भवन 6 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, तथा इसका बाहरी घेरा 533 मीटर का है। इस भवन का व्यास 507 मीटर है। इस भवन के चारों तरफ 10 मीटर ऊंची जालीदार लाल बलुआ पत्थर की बाउंड्री है। इस भवन के कुल 12 द्वार हैं, जिनमें 5 द्वारों के ऊपर मंडप बने हुए हैं।

इमारत का निकला भाग लाल पत्थर से बना हुआ है, तथा ऊपरी भाग पीले पत्थर से निर्मित है। इस भाग में समान दूरी पर बने 27 फीट ऊँचे 144 विशाल खंभे हैं। जो कि इस भवन की भव्यता में कई गुना वृद्धि करते हैं। यह खंभे पहली मंज़िल पर गोलाकार बरामदे में लगे हुए हैं।

इस इमारत में ग्राउंड फ्लोर से सेंट्रल हॉल जाने का सीधा रास्ता है। जबकि लोकसभा, राज्यसभा व लाइब्रेरी कक्ष में जाने के लिए आउटर लॉबी से जाना पड़ता है। इस भवन में भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, महाराणा प्रताप आदि कई जन नायकों की प्रतिमाएं लगी हुई हैं। जोकि महान  लोकतांत्रिक देश के इतिहास की रक्षा करती हुई प्रतीत  होती हैं।

भारतीय संसद भवन का इतिहास व भवन की कहानी
“Subject: The street view of the Indian Parliament in New Delhi, India.Location: New Delhi, India.”

सेंट्रल हॉल

राष्ट्रपति भवन की यह वो जगह है, जहां पर भारत माता की गुलामी की बेड़ियों को काटा गया। यहीं पर भारत ने ब्रिटिश राज से आजादी के बाद पहली सांस ली। इस भवन में राष्ट्रपति संसदीय सत्र की शुरुआत करते हुए दोनों सदनों को संबोधित करते हैं। जनवरी 1950 में इसका नाम सेंट्रल हॉल रखा गया। इससे पहले इसे कांस्टीट्यूएंट असेंबली हॉल कहा जाता था। यहां पर विश्व की महान हस्तियां सांसदों को संबोधित करती आई हैं।

सेंट्रल हॉल एक बड़ा गोलाकार कमरा है, जो कि तीन दरवाज़ों से सुसज्जित है। इसमें लगा 98 फीट व्यास वाला विशाल गुंबद इस कमरे का मुख्य केंद्र बिंदु है। इस गुंबद के ऊपर पत्थर का बना अष्टकोण गुंबद है। इस कमरे में अध्यक्ष की कुर्सी के सामने सदस्यों की कुर्सियां लगी हुई हैं। जहां पर दोनों सदनों के सदस्य बैठते हैं। इस कमरे की दीवारों पर महान नेताओं के चित्र लगे हुए हैं।

12 फरवरी, 2019 को यहां भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई की पेंटिंग लगाई गई थी। इस कमरे में लोहे के खंबों पर पंखे उल्टे लगे हुए हैं। इसकी दीवारों पर ब्रिटिश शासन के समय के 12 प्रदेशों के राज्य चिन्ह लगे हुए हैं, जो कि राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। इस भवन की पहली मंजिल पर दर्शकों के बैठने के लिए  छह अलग-अलग स्थान बने हुए हैं। जिनमें से दो पत्रकारों के लिए, एक विशेष अतिथियों के लिए तथा बाकी तीन लोकसभा राज्यसभा सदस्यों के अतिथियों  के लिए हैं। सेंट्रल हॉल के बाहर लगी नेताओं की प्रतिमाएं इसे और भी भव्य बनाती हैं।

लोकसभा

550 लोगों की बैठने की क्षमता वाला। यह अर्ध गोलाकार कमरा 48 सौ स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैला है। इस कमरे में देश के नागरिकों द्वारा चुने गए 543 सदस्य बैठते हैं। इस कमरे का कालीन हरे रंग का होता है, जो कि यह दर्शाता है कि, भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस कमरे में लकड़ी की बहुत ही सुंदर कारीगरी की गई है। इसकी पहली मंजिल पर लॉबी में पत्रकारों तथा मेहमानों के लिए बैठने का इंतजाम है। इसकी दीवारों पर ब्रिटिश राज में भारत के 35 प्रांतों के राज्य चिन्ह तांबे से बने हुए हैं।

लोकसभा की कार्यवाही का संचालन स्पीकर द्वारा किया जाता है। स्पीकर की कुर्सी को सर हरबर्ट बेकन ने डिज़ाइन किया था। स्पीकर की कुर्सी के ठीक नीचे महासचिव व अन्य अफसर बैठते हैं। उनके आगे दाएं तरफ सत्ताधारी पक्ष, व बाई तरफ विपक्ष के सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई है। यहां पर बैठकर दोनों पक्ष अपनी बुद्धिमता और संयम के बल पर नए बिल पास करते हैं। जिससे कि देश को नई दिशा मिल सके।

राज्यसभा

जिस प्रकार लोकसभा को आम लोगों का सदन माना जाता है, उसी तरह राज्यसभा को विशिष्ट लोगों  का सदन कहा जाता है। यहां पर राष्ट्रीय स्तर की चर्चाओं में राज्यों के प्रतिनिधि अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। इस सदन का आकार लोकसभा से छोटा होता है। यहां का माहौल शांत व खुशनुमा होता है। इस सदन के सदस्य राज्य विधानसभा और विधान मंडलों के द्वारा चुने जाते हैं। धन विधेयक को छोड़कर सभी विधेयक राज्यसभा में भी पास होने जरूरी होते हैं। परंतु राज्यसभा किसी भी विधेयक के ऊपर सिर्फ अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। राज्यसभा का सभापति देश का उपराष्ट्रपति होता है।

लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी महासचिव प्रशासनिक और वैधानिक रूप से राज्यसभा की कार्रवाई चलाने में सहायता करता है। इस सदन में 245 सदस्य 6 वर्ष के लिए मनोनीत किए जाते हैं।

लाइब्रेरी कक्ष/चेंबर ऑफ प्रिंसेस

यह कक्ष राजा महाराजाओं के बैठने के लिए बनाया गया था। इस भवन की दीवारों पर गंगा, बुध आदि की 6 मूर्तियां लगी हुई है, तथा यहां भारत के रजवाड़ों के 102 राज्य चिन्ह लगे हुए हैं। 28 जनवरी, 1950 से यह कमरा सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रयोग किया जाता था। परंतु 1958 में सुप्रीम कोर्ट के लिए अलग भवन बनने के बाद, इसे लाइब्रेरी कक्ष के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। यहां पर भारत भारत का संविधान हिंदी व अंग्रेजी में रखा गया है। यहां पर सभी भाषाओं के अखबार व मैगज़ीन आते हैं। सदस्यों के पढ़ने लिखने के लिए यह बिल्कुल सही जगह हैं।

लोकसभा के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर ने बाहरी लॉबी की अंदरूनी दीवारों पर चित्रकारी का निर्णय लिया। जिसके लिए देश भर से चित्रकारों को बुलाकर दीवारों पर 124 पेंटिंग्स का निर्माण करवाया गया। इसके अलावा संसद भवन की दीवारों पर लिखे धार्मिक अभिलेख, इस महान देश के प्रतिनिधियों का उनके कार्य में मार्गदर्शन करते हैं। ये उनके लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं।

निष्कर्ष

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में संसद भवन लोकतंत्र का मंदिर है। यहां सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर देश को एक नई दिशा देते हैं। सांसदों के कंधों पर कुछ जिम्मेदारियां व फर्ज हैं। क्योंकि देश का हर एक नागरिक एक उम्मीद के सहारे सांसदों को चुनकर यहां भेजता है।

धन्यवाद

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