विश्व कैलेंडर का इतिहास व परिभाषा

कैलेंडर की परिभाषा Calendar

विश्व में कैलेंडर का इतिहास मानव इतिहास जितना ही पुराना है। प्राचीन समय में लोगों ने कैलेंडर की आवश्यकता महसूस की, ताकि वे अपने त्यौहार, धार्मिक उत्सव, फ़सलों या अन्य कई  महत्वपूर्ण घटनाओं को संजोकर रख सकें, इसीलिए उन्होंने कैलेंडर बनाए। प्राचीन कैलेंडर को देखकर हमें आश्चर्य होता है कि, उस समय आधुनिक टेक्नोलॉजी न होते हुए भी लोगों ने बहुत सटीक गणना की थी, हो सकता है उन लोगों के पास हम से भी अधिक अच्छी टेक्नोलॉजी मौजूद रही हो, जिससे वे पृथ्वी की घूर्णन गति, परिक्रमण गति और उसमें लगने वाले समय के बारे में इतनी सटीक जानकारी प्राप्त कर पाए।

भारत देश के भी कैलेंडर बहुत प्राचीन व वैज्ञानिक हैं। यह कैलेंडर चंद्रमा सूर्य ग्रह नक्षत्रों आदि सभी  को आधार मानकर बनाए गए हैं, जिनकी पूरी जानकारी पंचांग के रूप में  व्यवस्थित की जाती है। आज संपूर्ण विश्व में व्यापक रूप से ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलन में है। विश्व के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए विश्व के लगभग सभी देश ग्रेगोरियन कैलेंडर का अनुसरण करते हैं।

विश्व में कैलेंडर का इतिहास

एक समय था जब दुनिया में कोई कैलेंडर नहीं होता था। लोग मौसम व अनुभव के हिसाब से अपने दैनिक कार्य, कृषि, धार्मिक कार्य, आदि करते थे। धीरे धीरे लोगों ने अलग-अलग देशों में अपने हिसाब से कैलेंडर बनाए, क्योंकि पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर मौसम परिवर्तन का समय अलग होता है। सबसे पहले कैलेंडर की शुरुआत को किसी विशेष घटना से जोड़ दिया जाता था। मुख्यतः किसी राजा के राज्य अभिषेक के समय के साथ जोड़ा जाता था। आइए विश्व में विकसित कुछ प्राचीन कैलेंडरों के बारे में जानते हैं।

कैलेंडर के विभिन्न प्रकार

रोमन कैलेंडर

इस कैलेंडर को दुनिया का सबसे प्राचीन कैलेंडर माना जाता है। यह कैलेंडर रोम के राजा न्यूमा पोंपिलियस के समय में बना था। इस कैलेंडर में 304 दिन व 10 महीने होते थे।

जूलियन कैलेंडर

यह कैलेंडर जूलियन सीजर ने यह कैलेंडर ईसा पूर्व पहली शताब्दी में बनाया था। इसे यूनानी ज्योतिष सोसिजिनीस की मदद से बनाया गया, इस कैलेंडर में 365 दिन व 12 महीने होते थे। इसके महीने जुलाई का नाम जूलियन सीजर के नाम पर रखा गया, तथा अगस्त का नाम ऑगस्टस् के नाम पर रखा गया। इस कैलेंडर में वर्ष की शुरुआत जनवरी से मानी गई तथा इस कैलेंडर को ईसा के जन्म से 40 वर्ष पूर्व लागू किया गया।

ग्रेगोरियन कैलेंडर क्या होता है? ग्रेगोरियन कैलेंडर का इतिहास

ग्रेगोरियन कैलेंडर को सेंट बीड् नाम के एक धर्मगुरु ने बनाया था। इससे पहले वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर में लीप वर्ष की गणना सही नहीं थी। इसलिए इसमें संशोधन करके 1582 में एक नया कैलेंडर आया। इस ग्रेगोरियन कैलेंडर को अक्टूबर1582 ईस्वी में अपनाया गया। तथा इसमें पहले से चलती आ रही कमी को पूरा करने के लिए इसमें 10 दिन आगे कर दिए गए इसके लिए 5 अक्टूबर को 15 अक्टूबर बना दिया गया।

इस कैलेंडर को कई देशों में पसंद किया गया तथा समय समय पर अपनाया भी गया। ब्रिटिश ने 1752 में इस कैलेंडर को अपनाया, स्वीडन ने इसे 1752 में अपनाया, रूस में रूसी क्रांति के बाद 1917 में ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया, ग्रीस में 1923 के बाद ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया गया, भारत में 1752 में इस कैलेंडर को अपनाया गया था।

माया कैलेंडर क्या है

माया सभ्यता के लोग भी गणित और विज्ञान में बहुत पारंगत थे। उन लोगों ने एक कैलेंडर बनाया जिसमें 20 दिन के 18 महीने होते थे तथा वर्ष में 5 अतिरिक्त दिन जोड़ दिए जाते थे, इन 5 दिनों को अशुभ माना जाता था।

लीप वर्ष क्या होता है?

लीप वर्ष में फरवरी में 29 दिन होते हैं, तथा वर्ष में 365 के बजाय 366 दिन होते हैं, आइए ऐसा क्यों होता है, यह जानने का प्रयास करते हैं। 1 दिन की गणना पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा में लगने वाले समय से की जाती है।

पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर 365.24219 दिन में लगाती है या हम कह सकते हैं कि, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट और 40 सेकेंड में पूरी करती है जो कि लगभग 365 दिन 6 घंटे के बराबर होता है। यह अतिरिक्त 6 घंटे 4 साल में जोड़कर 24 घंटे या 1 दिन के बराबर हो जाते हैं।इसकी पूर्ति के लिए हर 4 वर्ष बाद एक दिन जोड़ दिया जाता है। इस 1 दिन को लीप डे कहते हैं। और वर्ष को लीप वर्ष कहते हैं।

लीप वर्ष की गणना कैसे की जाती है? अथवा लीप वर्ष कैसे निकाले

जो वर्ष चार से पूरी तरह विभाजित हो उसे लीप वर्ष कहते हैं। जैसे 2020, 2024, 2028 आदि लीप वर्ष हैं। परंतु यदि कोई वर्ष 100 का गुणज है, जैसे 1500, 1600, 1700 आदि तो ऐसा वर्ष यदि 400 से विभाजित होगा तब वह लीप वर्ष होगा अन्यथा वह साधारण वर्ष होगा। उदाहरण के लिए 1900 का वर्ष 4 से तो पूर्णत: विभाजित हो जाता है। परंतु 400 से विभाजित नहीं होता, इसलिए यह लीप वर्ष नहीं होगा।

भारत में कैलेंडर का इतिहास

भारत में  विश्व के साथ सामंजस्य बनाकर चलने के लिए अंग्रेजी कैलेंडर का प्रयोग किया जाता है। भारतीय कैलेंडर का इतिहास भी बहुत प्राचीन है। भारतीय शास्त्रों में वर्ष की गणना के लिए संवत कल्पाब्घ सबसे प्राचीन है, तथा इसके अलावा सृष्टि संवत और प्राचीन सप्त ऋषि संवत भी प्राचीन हैं।

भारत में समय की गणना युगों के अनुसार होती है, युगों के अनुसार सतयुग में ब्रह्म संवत, त्रेता युग में  वामन संवत, परशुराम संवत, और श्रीराम संवत थे। उसके बाद द्वापर युग में युधिष्ठिर संवत और कलयुग में कली संवत और विक्रम संवत प्रचलन में हैं।

भारत में 1952 में कैलेंडर सुधार समिति ने भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित कैलेंडर को चुना और उनका अध्ययन किया इनमें से शक संवत और विक्रम संवत को प्रमुखता दी गई तथा इन्हें अपनाया गया।

विक्रम संवत क्या है

भारत में विक्रम संवत को पहला पंचांग स्वीकार किया गया है। इसका नया साल दीपावली से शुरू होता है। विक्रम संवत 57 ईसवी पूर्व 23 फरवरी से शुरू हुआ यह पंचांग उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के राज्य अभिषेक का प्रतीक है।

इस संवत की गणना उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा यानी गुड़ीपड़वा से होती है, तथा दक्षिण भारत मैं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से इसकी गणना की जाती है। विक्रम संवत में 1 वर्ष में 360 दिन होते हैं। सूर्य चंद्र की गति के हिसाब से तिथियां घटती बढ़ती रहती हैं। इनका उपयोग ज्योतिष गणना में भी किया जाता है।

शक संवत का इतिहास

यह भारत का दूसरा पंचांग है जो कि, 78 ईस्वी पूर्व शालीवाहन राजा के राज्य अभिषेक से शुरू हुआ। 1951 में इसे राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता मिली राज पत्रों, आकाशवाणी और सरकारी कैलेंडर में  ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ इसका प्रयोग भी होता है।

इसमें महीनों के नाम विक्रम संवत के अनुसार ही हैं, लेकिन दिनों का निर्धारण अलग है। इसके प्रथम माह मे 30 दिन होते हैं, इसके अलावा भारत में और भी कई कैलेंडर प्रचलन में हैं  जो इस प्रकार हैं।

वीर संवत

जैन धर्म में वीर संवत का प्रयोग किया जाता है। इसमें विक्रम कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से 470 जोड़ने पर वीर सम्मत बनता है।

हिजरी कैलेंडर

इस कैलेंडर का प्रयोग इस्लाम में होता है। पैगंबर मोहम्मद ने 16 जुलाई, 622 ईस्वी को मक्का मदीना में हिजरत दी थी। यह कैलेंडर चंद्र वर्ष पर आधारित होता है। इसमें 354 दिन होते हैं, यह सौर वर्ष में 11 दिन छोटा है। इसलिए इसके अंतिम महीने में एक दिन जोड़ दिया जाता हैं।

भारतीय कैलेंडर में लीप वर्ष की गणना के लिए कैलेंडर सुधार समिति ने 1 वर्ष में 365 दिन व लीप वर्ष में 366 दिन। शक संवत में 78 दिन जोड़ने पर जो संख्या मिले वह संख्या अगर 4 से विभाजित हो तो वह लीप वर्ष होगा। अगर वर्ष 100 का गुण आ जाए तो लीप वर्ष के लिए उसे 400 से विभाजित करके देखना होगा। चैत्र प्रथम मास होगा चेत्र से भद्र तक 31 दिन के महीने तथा अश्विन से फाल्गुन तक 30 दिन के महीने होंगे लीप वर्ष में चैत्र मास 21 मार्च से शुरू होगा। व साधारण वर्ष में 22 मार्च से शुरू होगा। लीप वर्ष में चैत्र माह में 31 दिन तथा साधारण वर्ष में 30 दिन होंगे।

कैलेंडर की सहायता से ही मनुष्य अपना इतिहास संजोकर क्रम में रख सकता है। दुनिया के अलग-अलग भागों में समय-समय पर लैंडरों का आविष्कार हुआ, उसी की सहायता से हम आज इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से समझने के योग्य हुए हैं। आज के समय हम जो कैलेंडर प्रयोग कर रहे हैं, वे प्राचीन लोगों की ही बुद्धिमत्ता व अथक प्रयासों का परिणाम है। जिनमें समय-समय पर सुधार किए गए, ताकि पृथ्वी सूर्य ग्रह नक्षत्र आदि जिस प्रकार निश्चित समय से बंधे हुए हैं, उसी प्रकार पृथ्वी पर जीवन भी एक अनुशासित तरीके से चल सके, तथा लोग व्रत त्यौहार व अन्य कार्य सही समय पर कर सकें तथा अपना जीवन सुख में बना सके।

धन्यवाद

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