जंतर मंतर जयपुर

जयपुर का जंतर मंतर

जंतर मंतर भारत की एक ऐतिहासिक वेधशाला है। यह धरोहर भारत के स्वर्णिम इतिहास व ज्ञान विज्ञान की एक झलक प्रस्तुत करती है। इसमें खगोलीय पिंडों का अध्ययन करने के लिए पत्थरों द्वारा बनाए गए यंत्र लगे हुए हैं, जो आज भी सटीक जानकारी प्रस्तुत करते हैं। भारतवर्ष में कई स्थानों पर जंतर मंतर बनाए गए हैं। जोकि यहां के शासकों की ज्ञान विज्ञान की रुचि को व उनकी कड़ी मेहनत को दर्शाते हैं।

भारत में कितने जंतर मंतर हैं?

भारत वर्ष में कुल 5 प्राचीन वेधशालाएँ बनाई गई हैं यह वेधशालाएँ जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस और मथुरा में स्थित है। इनमें से जयपुर व दिल्ली की वेधशाला आज भी चालू हालत में हैं। जयपुर की वेधशाला भारत की 28 वी व राजस्थान की पहली धरोहर है, जिसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।

जंतर मंतर क्या है?

जंतर मंतर 18वीं शताब्दी की शुरुआत में बनाई गई एक प्राचीन भारतीय वेधशाला है। इसमें आकाशीय पिंडों का अध्ययन करने के लिए, व समय की जानकारी के लिए पत्थरों से बने बड़े-बड़े 14 यंत्र लगे हुए हैं।

जंतर मंतर का शाब्दिक अर्थ क्या है? 

जहां तक जंतर मंतर के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो यह दो शब्दों से मिलकर बना है, जंतर व मंतर जंतर, यंत्र शब्द से बना है। जिसका मतलब है, खगोलीय पिंडों के अध्ययन के लिए यहां लगे हुए उपकरण, तथा मंत्र का अर्थ है। विधि या सूत्र जिसका हम यंत्रों की सहायता से उपयोग करते हैं।

विश्व विरासत स्थल में शामिल

जयपुर के जंतर मंतर वेधशाला में लगे यंत्र मौसम की मार सह कर भी बिल्कुल बहुत अच्छी अवस्था में है, और आज भी इनकी सहायता से मौसम ग्रह नक्षत्रों स्थानीय समय आदि की बिल्कुल सही जानकारी मिल रही है। इसी कारण,

यूनेस्को UNESCO संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन द्वारा, जंतर मंतर को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। इसकी घोषणा वर्ल्ड हेरिटेज कमेटी द्वारा 34 वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान 1 अगस्त, 2010  को की गई थी। यह आयोजन ब्राजील की राजधानी ब्रासीलिया में हुआ था। यह स्मारक विश्व धरोहर में शामिल होने वाला भारत का  28 वां स्मारक है।

जंतर मंतर का पूरा इतिहास

जंतर मंतर का निर्माण जयपुर शहर के संस्थापक  राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर में करवाया। जंतर मंतर का निर्माण 1728 ईस्वी में शुरू किया गया, तथा इसका निर्माण कार्य 1734 में पूर्ण हुआ।

महाराजा जयसिंह की रुचि ज्ञान विज्ञान में अल्प काल से ही थी। वह अल्पकाल में ही  राजा बन गए थे उनकी हाजिर जवाबी के कारण औरंगजेब ने उन्हें  मौखिक सवाई की उपाधि दी।

महाराजा जयसिंह को खगोलीय विज्ञान की शिक्षा मराठी विद्वान पंडित जगन्नाथ सम्राट ने दी थी। जयसिंह ने भारतीय ग्रंथों के साथ-साथ यूनान, मध्य एशिया और यूरोप के ग्रंथों तथा यंत्रों का गहन अध्ययन व परीक्षण किया था।

सवाई जयसिंह एक नीति कुशल शासक के साथ-साथ जाने-माने वैज्ञानिक व खगोलविद भी थे। वे तुर्की, संस्कृत, मराठी, अरबी आदि कई भाषाओं के अच्छे जानकार थे। उन्होंने भारतीय ग्रंथों के साथ-साथ गणित खगोल ज्योतिष आदि कई ग्रंथों का अध्ययन किया था। और उनको अपनाया भी था। वह देश विदेश के खगोलीय वैज्ञानिकों, तथा विद्वानों को बुलाते थे, तथा सम्मानित करते थे। तथा उनके साथ ज्ञान विज्ञान के बारे में विचार विमर्श करते थे।

महाराजा जयसिंह  के इस दूरदृष्टि स्वभाव व वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण भारत में जंतर मंतर जैसी अतुलनीय वेधशाला का निर्माण करवाया गया। जिससे कि ज्योतिष, मौसम की भविष्यवाणी और कई अन्य आकाशीय गतिविधियों के बारे में विश्व को ज्ञान मिल सका, तथा इस और सभी का ध्यान आकर्षित हुआ।

जयपुर के स्थानीय पंचांग का प्रकाशन

जयपुर में जंतर मंतर में लगे यंत्रों के द्वारा की गई गणना के अनुसार ही आज भी जयपुर के स्थानीय पंचांग का  प्रकाशन किया जाता है। तथा हर वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को खगोलीय शास्त्री मिलकर इस वेधशाला में लगे यंत्रों की सहायता से पवन धारा पृथ्वीया से आने वाली वर्षा के बारे में भविष्यवाणी करते हैं। इनकी सहायता से लगने वाले सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण आदि कई घटनाओं की पूर्व भविष्यवाणी की जाती है। तथा उनका ब्योरा पंचांग में भी दिया जाता है।

जयपुर के जंतर मंतर की विशेषताएं

इसकी सहायता से स्थानीय समय, ग्रह नक्षत्रों, मौसम, ग्रहण आदि घटनाओं की भविष्यवाणी की जा सकती है। इस वेधशाला में विराट सम्राट यंत्र जो कि दुनिया की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी है। इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। इसका पिछला भाग दो भागों में बटा हुआ है। एक  भाग सुबह 6:00 से 12:00 का समय बताता है, तथा दूसरा शाम 12:00 से 6:00 का समय बताता है। इसमें अन्य भी कई यंत्र हैं, जैसे जयप्रकाश यंत्र जिससे एल्टीट्यूड का पता लगाया जा सकता है। चक्र यंत्र जिससे समय का पता लगता है, आदि कई लगे हुए हैं।

जंतर मंतर में बने  सभी  यंत्र उच्च क्वालिटी के पत्थरों व संगमरमर से बने हुए हैं। क्योंकि पत्थरों पर धूप गर्मी का असर नहीं पड़ता है। इसके विपरीत धातु  के यंत्रों पर धूप गर्मी मौसम का प्रभाव पड़ता है।  जिनसे उनका आकार परिवर्तित हो जाता है, तथा सटीक जानकारी नहीं मिल पाती, इसीलिए जंतर मंतर में यंत्रों का निर्माण पत्थरों और चट्टानों से किया गया है।

जंतर मंतर के बारे में जानकारी

जयपुर की वेधशाला 1.8652 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उपकरण उच्च क्वालिटी के पत्थर व संगमरमर से बने हुए हैं, जो कि आज भी सटीक जानकारी देते हैं।

जंतर मंतर के उपकरणों की जानकारी

जयपुर के जंतर मंतर में कुल 14 यंत्र लगे हुए हैं, जो कि आकाशीय पिंडों मौसम व समय की जानकारी देते हैं, उनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है।

जयप्रकाश यंत्र- जयप्रकाश यंत्र के दो भाग हैं। भाग क और  भाग  ख इसके निर्माण कर्ता व अविष्कारक जयसिंह थे।  यह एक कटोरे की तरह का यंत्र है। जिसके किनारे को क्षितिज माना जाता है, तथा  इससे आकाशीय पिंडों की जानकारी मिलती है। इससे सूर्य किस राशि में स्थित है, इसका भी पता चलता है।

सम्राट यंत्र- यह यंत्र 90 फीट ऊंचा बना हुआ है। इससे ग्रह नक्षत्रों की कांति विषुवांश व समय की जानकारी देता है।

लघु सम्राट यंत्र- यह यंत्र एक सूर्य घड़ी या धूप गाड़ी है। जिससे स्थानीय समय का पता चलता है।

उन्नतांश यंत्र- यह यंत्र आकाशीय पिंडों की स्थिति, व दूरी की गणना करने का काम करता है।

दिशा यंत्र- यह यंत्र दिशाओं की जानकारी देता है। यह जंतर मंतर परिसर के बीचो बीच बना हुआ है।

नाड़ीवलय यंत्र- इससे सूर्य की स्थिति और स्थानीय समय का पता चलता है।

दक्षिणोदक भित्ति यंत्र- यह यंत्र मध्याह्न समय में सूर्य के उनतांस, दिन मान आदि की जानकारी देता है।

षष्ठांश यंत्र- यह यंत्र सम्राट यंत्र का ही एक भाग है जो ग्रह नक्षत्रों के अंश व उनकी स्थिति का ज्ञान करवाता है

ध्रुवदर्शक पट्टिका- इस यंत्र से ध्रुव तारे की स्थिति का पता चलता है तथा दिशाओं का भी ज्ञान होता है

राशि वलय यंत्र- यह यंत्र 12 राशियों के बारे में जानकारी देता है। इसके लिए 12 विभिन्न यंत्र हैं।

चक्र यंत्र-  इस यंत्र से तात्कालिक भौगोलिक निर्देशकों को मापा जाता है।

राम यंत्र-  इस यंत्र से खगोलीय गणना की जाती हैं।

दिगंश यंत्र-  इसके द्वारा पिंडों के कोण का मापन किया जाता है।

जयपुर का जंतर मंतर भारतीय मस्तिष्क की बेमिसाल ताकत और भारतीय लोगों की कड़ी मेहनत का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने बिना किसी आधुनिक यंत्रों की सहायता से, ऐसी संरचना बनाकर खड़ी कर दी, जिसका संसार मे कोई मुकाबला नहीं है। जो कि आज भी चालू हालत में है। जयपुर के जंतर मंतर का पूरा इतिहास बड़ा ही गौरवशाली है। यह स्मारक पुरातात्विक स्थल और पूरावशेष अधिनियम 1961 के तहत संरक्षित किया गया है।

आमेर किला जयपुर के बारे मे पढ़े ।

धन्यवाद

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