अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस कब मनाया जाता है

अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस International Day for the Preservation of Ozone Layer 16 September

पृथ्वी के धरातल से लेकर लगभग 400 किलोमीटर ऊंचाई तक, वायु की परत पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी से चिपकी हुई है, इसे वायुमंडल कहते हैं। इसमें 20 किलोमीटर से 50 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर ओज़ोन गैस पाई जाती है। जिसे पृथ्वी का सुरक्षा कवच भी कहते हैं, क्योंकि यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों तथा अन्य विकिरणों को भी पृथ्वी पर आने से रोकती है। अगर यह परत में हो तथा सूर्य की हानिकारक किरणे पृथ्वी पर पहुंच जाएं तो इससे पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ जाएगा, तथा जलवायु परिवर्तन आ जाएगा। इसके अलावा पराबैंगनी किरणों से कई प्रकार के रोग पैदा हो जाएंगे, जिससे जीव-जंतु पेड़-पौधे व जलीय जीव नष्ट हो जाएंगे। इसीलिए इस परत के संरक्षण  के लिए जागरूकता हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओज़ोन संरक्षण दिवस मनाया जाता है।

ओजोन डे कब मनाया जाता है? ओज़ोन दिवस की घोषणा कब की गई?

ओज़ोन परत क्यों चिंतनीय हैं?

1970 के दशक में एक वैज्ञानिक दल ने यह पता लगाया कि ओज़ोन परत को नुकसान पहुंच रहा है, और इसका कारण धरती पर बढ़ रही क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस है। यह गैस बढ़ने के कारण वायुमंडल में पहुंचने के कारण शोभ मंडल में ओज़ोन गैस नष्ट होने लगी है, जिससे पृथ्वी पर पराबैंगनी किरणों का खतरा बढ़ गया है। तथा ग्लोबल वार्मिंग का भी खतरा बढ़ गया है।

अंतर्राष्ट्रीय ओज़ोन संरक्षण दिवस की घोषणा कब की गई?

ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में ओज़ोन संरक्षण दिवस हर वर्ष 16 सितंबर को मनाने की घोषणा की, क्योंकि इस दिन ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए मॉन्ट्रियल समझौता हुआ था।

विश्व ओजोन दिवस 2020 थीम“Ozone for Life”

अंतर्राष्ट्रीय ओजोन संरक्षण दिवस का इतिहास/ मोंट्रियल समझौता (Montreal Protocol) क्या है?

80 के दशक की शुरुआत में जब यह पता चला कि ओज़ोन परत को भारी नुकसान पहुंच रहा है, तो इसके लिए 16 सितंबर, 1987 को ओज़ोन परत की रक्षा के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए। उस समय 46 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, बाद में बढ़कर 197 देश इसमें शामिल हो गए। इससे पहले 22 मार्च, 1985 को ओज़ोन परत को बचाने के लिए वियना में 28 देशों ने एक समझौता किया तथा इस समझौते में भी शामिल होने वाले देशों की संख्या 197 तक पहुंच गई। इन समझौतों के तहत ओज़ोन परत को नुकसान करने वाले हानिकारक पदार्थों के प्रयोग और उत्पादन पर रोक लगाना था। ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में लगभग 100 रसायनों को शामिल किया गया।

मॉन्ट्रियल समझौते के तहत क्लोरो फ्लोरो कार्बन और हाइड्रो क्लोरो फ्लोरो कार्बन को रोकने के लिए समय सीमा तय की गई विकसित देशों के लिए यह सीमा 2030 व विकासशील देशों के लिए यह सीमा 2040 तक रखी गई। यह समझौता 1 जनवरी, 1989 से लागू हो गया। इसके बाद इसमें करीब 8 बार संशोधन किया जा चुका है। बहुत से देशों ने इसके लक्ष्यों को बहुत अच्छे से प्राप्त किया है, इसीलिए 2003 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के महासचिव ने इसे अब तक का सबसे कामयाब समझौता बताया।

ओज़ोन गैस क्या है? या ओजोन परत क्या है?

ओज़ोन गैस ऑक्सीजन का ही एक रूप है। इस गैस में ऑक्सीजन के 3 परमाणु आपस में जुड़े हुए होते हैं। इस गैस का रंग हल्का नीला होता है, तथा इस गैस से तेज गंध आती है। सूर्य के विकिरणों से ऑक्सीजन के अणु टूट कर ओज़ोन का निर्माण करते हैं, तथा यह गैस ऊपरी वायुमंडल में फैल कर ओज़ोन परत बनाती है। इस गैस को पृथ्वी का रक्षा कवच माना जाता है, क्योंकि यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों का  95% भाग सोख लेती है, और पृथ्वी की रक्षा करती है।

ओज़ोन गैस की अधिकता ओज़ोन मंडल में होती है। तथा यह गैस ऊपरी संताप मंडल में भी पाई जाती है, जो कि सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से रक्षा करती है।

फ़ैक्टरियों के प्रदूषण यातायात के साधनों के प्रदूषण से ओज़ोन गैस बनती है, जो कि एक तरह का प्रदूषण है, और यह भी हमारे लिए एक चिंतनीय विषय है। इसकी वजह से भी पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, और ध्रुवों की बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है। जिस प्रकार एक तरफ ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन गैस हमारे रक्षा कवच है। उसी तरह पृथ्वी के पास यह गैस हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है।

ओज़ोन गैस कम होने से क्या खतरे हैं?

ओज़ोन गैस पृथ्वी के लिए एक  ढाल की तरह है। जो कि सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को हम तक पहुंचने से रोकती हैं। अगर यह पैराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुंच जाएं तो इससे मनुष्य, जीव जंतु, पेड़ पौधे,  जलीय जीव आदि सभी को खतरा है। इससे डीएनए की संरचना में परिवर्तन आ सकता है, व त्वचा के कई रोग व कैंसर आदि हो सकते हैं। इनकी वजह से रोग प्रतिरोधक क्षमता पर बुरा असर पड़ता है, व गर्भस्थ शिशुओं के लिए भी यह किरणें बहुत बड़ा खतरा है। इन किरणों की वजह से वायुमंडल का तापमान तेजी से बढ़ेगा। जिससे कि ध्रुवों की बर्फ पिघल जाएगी और जल स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्र समुंदर में डूब जाएंगे, जिससे मानव जाति को बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।

ओज़ोन परत को कौन सी गैसों से खतरा है?

AC व फ्रिज में  काम आने वाली क्लोरो फ्लोरो कार्बन गैस ओज़ोन गैस के लिए खतरा है। क्योंकि इस गैस के क्लोरीन अणु ओज़ोन को नुकसान पहुँचाते हैं। ये अणु ओज़ोन के साथ मिलकर क्लोरीन मोनोऑक्साइड बनाते हैं। इसके इसके अलावा भी अन्य कई गैस हैं, जैसे CFC112, CFC112A, ट्राईक्लोरोइथेन आदि गैसें भी ओज़ोन परत के लिए खतरा हैं। इसलिए हमें इन गैसों से ओज़ोन परत को बचाना होगा।

भारत में ओजोन का असर

विश्व में ओज़ोन के कारण हो रही अकाल मृत्यु में सबसे अधिक भारत में ही हो रही हैं। डिस्ट्रिक्ट ऑफ ग्लोबल रिपोर्ट 2017 के अनुसार भारत में ओज़ोन के कारण मृत्यु में 150 गुना इज़ाफा हुआ। मौतों के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया। इसलिए हम कह सकते हैं की, ओज़ोन  गैस का भारत को बहुत अधिक खतरा है। भारत सरकार ने क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उपयोग व उत्पादन पर 2010 से ही रोक लगाने शुरू कर दी थी, तथा ओज़ोन प्रदूषण को रोकने के लिए भारत सरकार बड़े पैमाने पर कार्य कर रही है। सभी व्यक्तियों को चाहिए कि वे भी अपने स्तर पर प्रदूषण को फैलने से जितना हो सके रोके।

पिछले कुछ वर्षों में यह पाया गया है कि, अटलांटिक के ऊपर ओज़ोन परत में काफी सुधार हुआ है। जिससे पृथ्वी के ऊपर पैराबैंगनी किरणों से होने वाले खतरे मैं कमी आई है। जिससे जलवायु परिवर्तन नहीं होगा लेकिन साथ ही साथ देखा जाए तो अन्य कई प्रदूषण से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। जिससे ओज़ोन परत होने के बाद भी बड़ा खतरा बना हुआ है। इसके लिए CFC और HCFC रसायनों को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इनके प्रयोग पर पूरी तरह से पाबंदी लगनी चाहिए, ताकि पृथ्वी को जीवन जीने लायक बनाकर रखा जा सके।

धन्यवाद

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